छत्तीसगढ के बस्तर संभाग के तीन अति संवेदनशील जिलों के तीन सौ से अधिक गांवों में जनगणना कार्य किया जाना नामुमकिन है तथा कुछ इलाकों में जनगणना कार्य के लिए
हेलीकाप्टर की मांग की गई है 1 नक्सली बहुल इन संवेदनशील इलाकों के ग्राम प्रमुख और पंचायत
प्रतिनिधि इस कार्य में सहयोग करने से कतरा रहे हैं 1 इन क्षेत्रों में
नक्सली जनगणना कर्मचारियों को लौटा रहे हैं तथा उनके दस्तावेजों
को आग के हवाले कर रहे हैं 1
आधिकारिक जानकारी के अनुसार बीजापुर जिले के 214 गांव में
जनगणना कार्य किया जाना नामुमकिन लग रहा है जिसमें
भोपालपटनम तहसील के 70 .बीजापुर तहसील के 40. भैरमगढ
तहसील के 40 तथा उसूर विकासखंड के 60 गांव शामिल हैं 1 भैरमगढ
इलाके में नक्सलियों ने कर्मचारियों के दस्तावेज लूटकर उसे आग के
हवाले कर दिये तथा इन गांवों में पहुंचे कर्मचारियों को नक्सलियों ने
जनगणना कार्य नहीं किए जाने की चेतावनी भी दी और उन्हें वापस
लौटा दिया1
जिला प्रशासन ने इस स्थिति से निपटने के लिए ग्राम प्रमुख और
पंचायत प्रतिनिधियों से संपर्क कर संवेदनशील इलाके में जनगणना
कार्य कराने का अनुरोध किया है लेकिन लोगों ने इसे नजरअंदाज कर
दिया1 अब प्रशासन द्वारा साप्ताहिक हाट बाजार में जनगणना की
मुनादी करने की तैयारी की जा रही है 1
दंतेवाडा जिले के कोंटा विकासखंड की 57 ग्राम पंचायतों के
लगभग दो सौ अतिसंवेदनशील इलाकों में कर्मचारियों ने अपनी जान
जोखिम में डाल जनगणना कार्य को बखूबी निभाया1 इसके बावजूद
इस इलाके के लगभग पचास गांवों में जनगणना कार्य नहीं हो पाया 1
कुछ इलाकों में पहुंचने के लिये हेलीकाप्टर की मांग की गई है 1 साथ
ही साप्ताहिक हाट बाजारों में भी जनगणना कार्य किए जाने की तैयारी
भी चल रही है 1
नारायणपुर जिले के ओरछा विकासखंड के 337 गांवों में से 75
गांवों में जनगणना कर्मचारी किसी भी स्थिति में जनगणना कार्य को
संपन्न नहीं करा सकते 1 नक्सलियों ने इन इलाकों से कर्मचारियों को
भगा दिया और 26 गांव में कर्मचारियों का सामान लूट लिये तथा 49
गांवों से कर्मचारियों को वापस भेज दिया1 अब यहां के हाट बाजार में
जनगणना कार्य कराए जाने के लिये तैयारी की जा रही है 1
इधर संवेदनशील क्षेत्रों से लौटे कर्मचारियों ने बताया कि दहशत भरे
माहौल में इन इलाकों में वे जनगणना कार्य के लिऐ गये थे लेकिन
नक्सलियों ने उन्हें लौटा दिया1
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I am a journalist in Raipur, Chhattisgarh, more than 12years.I have been associated with Swatantra Mat, Jabalpur, The Hitavada, Jabalpur, Doordarshan, All India Radio Raipur. I have reported various important events during my job and I am looking forward to have better chance to report basic issues in the time to come.
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Friday, June 4, 2010
Friday, May 21, 2010
आत्मघाती दस्ते बना रहे नक्सली
श्रीलंका से भागे लिट्टे के कई हार्ड कोर कमांडर न केवल नक्सलियों को मानव बम बना रहे हैं बल्कि उन्हें गुरिल्ला वार और हथियार चलाने के गुर भी सिखा रहे हैं। इससे भी खतरनाक तथ्य यह है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई नक्सलियों को बड़े पैमाने पर आधुनिक हथियार और फंड मुहैया करा रही है। खुफिया नजर में रेड तालिबान कहे जाने वाले नक्सलियों ने अब अरबन सेल गठित कर रेड कारिडोर पर ध्यान केंद्रति कर रहे हैं।
फिया सूत्रों के अनुसार नक्सलियों की बढ़ रही ताकत का कारण पाक खुफिया एजेंसी द्वारा धन मुहैया कराना और लश्कर-ए-तय्यबा द्वारा हथियार मुहैया कराना है। अत्याधुनिक हथियारों से इनके हाथ मजबूत हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार श्रीलंका में पस्त हुए लिट्टे के कई हार्ड कोर कमांडर अब नक्सलियों के संपर्क में आ गए हैं। श्रीलंका से भागकर लिट्टे के लोग आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उड़ीसा के समुद्री रास्ते से भारत आ गए हैं। वे नक्सलियों के गुरू बन गए हैं। श्रीलंका से भागे लिट्टे के लोग नक्सलियों के ट्रेनर बन गए हैं। वे उन्हें गुरिल्ला वार और हथियार चलाने की ट्रनिंग दे रहे हैं। नक्सलियों को ये लोग मध्य और दक्षिण भारत के दूर दराज इलाकों में प्रशिक्षण दे रहे हैं। सूत्रों के अनुसार नक्सलियों को 40 से ज्यादा एलटीटीई ट्रेनर प्रशिक्षित कर रहे हैं। मध्य और दक्षिण भारत के कुछ भाग पर नक्सलियों का पूरा वर्चस्व है।
सूत्रों के अनुसार नक्सली अब आत्मघाती दस्ता भी तैयार कर रहा है। इसके लिए उन्हें लिट्टे द्वारा ट्रेनिंग दी जा रही है। नक्सली कैडर करीब 25 हजार तक पहुंच गई है। इसमें लगभग सात हजार एलटीटीई द्वारा गुरिल्ला वार और हथियार चलाने में प्रशिक्षित हैं। सूत्रों के अनुसार पाक आतंकवादियों की तरह अब नक्सली भी हर घटना का वीडियो बना कर देखते हैं। उससे आंकते हैं कि किसने क्या और कितना काम किया।
उसी के हिसाब से उन्हें प्रोन्नति दी जाती है। नक्सलियों ने अब लड़ने के साथ-साथ अपना ध्यान शहरी क्षेत्र पर केंद्रित किया है। इसके लिए अरबन सेल गठित किया है। इसका काम विश्वविघालय में गरीब छात्रों पर डोरे डालना और प्रतिभावान छात्रों को थिंक टैंक के रूप में जोड़ना है। ताकि वे राजनीति से लेकर तमाम बुद्धिजीवी क्षेत्र में घुस सकें और पर्दे के पीछे उनकी मदद करें। यह खुलासा खुफिया विभाग के हाथ लगी की नक्सलियों की किताब से हुआ है। खुफिया विभाग ने केंद्र को चेताया है कि नक्सली अब अपना नया कार्य क्षेत्र बनाना शुरू किया है। वे अब औघोगिक क्षेत्र और विशेष आर्थिक जोन पर अपनी ताकत झोकेंगे। यहां उनको टारगेट करना आसान होगा।
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Sunday, March 28, 2010
तार पर लटककर जाते हैं स्कूल
स्कूल जाने के लिए बच्चों को आपने पैदल चलते, तो कभी साइकिल, ऑटोरिक्शा या फिर बस की सवारी करते कई बार देखा होगा। लेकिन यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि दुनिया में एक स्थान ऎसा भी है, जहां स्कूल जाना इतना आसान नहीं है। जी हां, यहां बच्चों को पहाडियों के बीच जिप तारों पर घिर्री की सहायता से लटकते हुए करीब 40 मील प्रति घंटे की गति से रास्ता तय करना पडता है, जिससे वे नियमित रूप से कक्षाओं तक पहुंच सकें।
'डेली मेल' की खबर के अनुसार कोलंबिया में रियो नेग्रो नदी से करीब 400 मीटर ऊंचाई पर इन तारों की व्यवस्था है। दूसरे छोर पर पहुंचने के लिए बच्चे आधे मील की दूरी तय करते हैं। राजधानी बोगोटा से 40 मील दक्षिण-पूर्व पर स्थित इस क्षेत्र में रह रहे कुछ परिवारों के लिए यहां एक घाटी को दूसरी घाटी से जोडने के लिए इस तरह के 12 स्टील केबल एकमात्र जरिया हैं।
बताया जा रहा है कि सबसे पहले जर्मनी के अन्वेषणकर्ता अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट ने 1804 में इन विशेष रास्तों को देखा था। तब इन्हें पारंपरिक रूप से सन (हैंप) से बनाया जाता था। बाद में इनकी जगह स्टील केबल्स लगाए गए। इसके बाद यहां लोगों ने खेती और पशुपालन करने की शुरूआत कर दी।
आवाजाही का एकमात्र जरिया वर्तमान में यहां रह रहे सभी लोगों के लिए दूसरे स्थान तक पहंुचने के लिए कोई अन्य जरिया नहीं है। ये सभी पूरी तरह से इन्हीं केबल्स पर निर्भर हैं। किसानों को अपने उत्पादों को अन्य स्थानों पर पहंुचाना हो, या फिर नन्हे बच्चों को स्कूल जाना हो, सभी को इन्हीं तारों से होकर गुजरना होता है। कई बार बच्चों को गति को नियंत्रित करने के लिए खुद को जूट बैग में बैठाकर कुल्हाडी जैसे यंत्र की मदद से संतुलन बनाते हुए चलते हुए भी देखा जा सकता है।
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'डेली मेल' की खबर के अनुसार कोलंबिया में रियो नेग्रो नदी से करीब 400 मीटर ऊंचाई पर इन तारों की व्यवस्था है। दूसरे छोर पर पहुंचने के लिए बच्चे आधे मील की दूरी तय करते हैं। राजधानी बोगोटा से 40 मील दक्षिण-पूर्व पर स्थित इस क्षेत्र में रह रहे कुछ परिवारों के लिए यहां एक घाटी को दूसरी घाटी से जोडने के लिए इस तरह के 12 स्टील केबल एकमात्र जरिया हैं।
बताया जा रहा है कि सबसे पहले जर्मनी के अन्वेषणकर्ता अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट ने 1804 में इन विशेष रास्तों को देखा था। तब इन्हें पारंपरिक रूप से सन (हैंप) से बनाया जाता था। बाद में इनकी जगह स्टील केबल्स लगाए गए। इसके बाद यहां लोगों ने खेती और पशुपालन करने की शुरूआत कर दी।
आवाजाही का एकमात्र जरिया वर्तमान में यहां रह रहे सभी लोगों के लिए दूसरे स्थान तक पहंुचने के लिए कोई अन्य जरिया नहीं है। ये सभी पूरी तरह से इन्हीं केबल्स पर निर्भर हैं। किसानों को अपने उत्पादों को अन्य स्थानों पर पहंुचाना हो, या फिर नन्हे बच्चों को स्कूल जाना हो, सभी को इन्हीं तारों से होकर गुजरना होता है। कई बार बच्चों को गति को नियंत्रित करने के लिए खुद को जूट बैग में बैठाकर कुल्हाडी जैसे यंत्र की मदद से संतुलन बनाते हुए चलते हुए भी देखा जा सकता है।
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Friday, March 19, 2010
उपेक्षित धरोहर, बेसुध सरकार
दक्षिण कोसल के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरातात्विक स्थलों में की सूची में सिरपुर का स्थान सर्वोच्च है। महानदी के तट पर स्थित सिरपुर अतीत में सदियों से सांस्कृतिक विविधता एवं वास्तुकला का केन्द्र रहा है। सोमवंशी शासकों के काल में इसे दक्षिण कोसल की राजधानी होने का गौरव भी प्राप्त था। सातवीं सदी में चीन के महान पर्यटक तथा विद्वान ह्वेनसांग ने सिरपुर की यात्रा की थी। उनके अनुसार सिरपुर में उस समय करीब 100 संघाराम थे, जिनमेें महायान संप्रदाय के दस हजार भिक्षु निवास करते थे। यह स्थल दीर्घकाल तक ज्ञान-विज्ञान और कला का केन्द्र बना रहा। सिरपुर के पुरावैभव की ओर सबसे पहले ब्रिटिश विद्वान बेगलर व सर अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्टस ऑफ इंडिया में प्रारंभिक विवरण प्रकाशित किए थे। सिरपुर में वर्ष 1953 से 1956 में बीच सागर विश्वविद्यालय एवं मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा संयुक्त रूप से डॉ. एम.जी. दीक्षित के निदेशन में उत्खनन का कार्य करवाया गया। इस खुदाई में यहां टीले के भीतर दबे हुए दो बौद्ध विहार सामने आए। इसके अलावा पुरातात्विक महत्व की अनेक वस्तुएं भी मिलीं।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद सन् 2000 से वरिष्ठ पुरातत्वविद् अरूण कुमार शर्मा के निदेशन में उत्खनन का कार्य शुरू हुआ। इन दस वर्षों में सिरपुर में 38 टीलों की खुदाई की जा चुकी है। यहां करीब 184 टीलें हंै। सिरपुर में देश की पहली वेद पाठशाला मिली है। इसके अलावा यहां हिन्दू, जैन, बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्म के प्रमाण भी मिले हैं। शैव और वैष्णव धर्म के धर्मावलंबियों के बीच की खाई पाटने के लिए इस ऐतिहासिक स्थल पर छह हरिहर मंदिर भी प्राप्त हुए हैं। खुदाई के दौरान अब तक यहां 18 मंदिर, 8 बुद्ध विहार और 3 जैन मंदिर मिले हैं। एक बड़ा महल और प्रधानमंत्री निवास भी प्राप्त हुआ है। सिरपुर में महानदी धनुष का आकार लिए है। इस उत्खनन में एक महत्वपूण बात यह भी सामने आई है कि सिरपुर एक पूर्ण विकसित नगर होने के साथ ही बड़ा शैक्षणिक व्यापारिक और आयुर्वेदिक केन्द्र भी था। पूर्णत: वास्तु के अनुरूप बने इस नगर में कई आर्युेदिक स्नानागार भी मिले हैं। साथ पूरे नगर में भूमिगत नालियां होना यह सिद्ध करता है कि सिरपुर कितना विकसित है। दुर्भाग्य कि बात है कि सदियों पहले जहां पानी की निकासी के लिए भूमिगत नालियां होती थीं वहीं आज इक्कीसवीं सदी में राजधनी रायपुर के लोग इस सुविधा से वंचित हैं।
सिरपुर के आसपास रहने वालों लोगों में सदियों से एक किदवंती चली आ रही है कि यहां अढ़ाई वर्ष का खर्चा छुपा हुआ है। यहां खर्चा से आशय धन या संपत्ति है। उत्खनन से यह किदवंती सही साबित हुई। दरअसल, पिछले वर्ष खुदाई के दौरान यहां अन्नागार मिले। अब तक 48 अन्नागार प्राप्त हो चुके हैं। इन अनाज भंडारों में इतना अनाज समा सकता है कि अगर ढ़ाई वर्ष तक अकाल पड़े , (ई. पूर्व तीसरी शताब्दी में) तब भी दक्षिण कोसल की जरूरत को पूरा किया जा सकता था। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि सिरपुर का इतना समृद्ध इतिहास होते हुए भी देश-दुनिया के पर्यटकों और विद्यार्थियों को जानकारी देने की कोई पहल संस्कृति विभाग द्वारा नहीं की गई है। यहां जाने वाले पर्यटकों को जानकारी देने के लिए कोई गाईड तब उपलब्ध नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि उत्खनन के दौरान मिली बेशकीमती पुरावस्तुओं को प्रदर्शित करने के लिए अभी तक सिरपुर में कोई संग्रहालय तक नहीं बनाया जा सका। पुरातत्वविद् अरूण कुमार शर्मा ने इस ओर कई बार विभाग के अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट भी कराया। वहीं छत्तीसगढ़ में उत्खनन के विशेषज्ञ पुरातत्वविदों की भी कमी है। राज्य के विश्वविद्यालयों में प्राचीन इतिहास तो पढ़ाया जाता है लेकिन आज तक कभी भी पंडित रविशंकर शुक्ल या गुरू घासीदास विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को सिरपुर का भ्रमण नहीं कराया गया, ताकि वे अपने राज्य की इस समृद्ध विरासत को नजदीक से देख और समझ सकें। इसके अलावा उत्खनित स्थलों को जिस लापरपाही से बिना किसी सुरक्षा के छोड़ दिया गया है, वह भी चिंता का विषय है। पुरात्व और संस्कृति विभाग द्वारा मौजूदा वित्त वर्ष में ऐसे स्थलों के अनुरक्षण के लिए 58 लाख रूपए खर्च किए गए हैं, इसके बावजूद इन स्थलों का सौंदर्यीकरण तक नहीं हो सका है। उत्खनन के नाम पर करोड़ों रूपए खर्च कर देने से ही इसे विश्व मानचित्र पर नहीं लाया जा सकता है, इसके लिए स्थलों का उचित रख-रखाव और सौंदर्यीकरण भी आवश्यक है।
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छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद सन् 2000 से वरिष्ठ पुरातत्वविद् अरूण कुमार शर्मा के निदेशन में उत्खनन का कार्य शुरू हुआ। इन दस वर्षों में सिरपुर में 38 टीलों की खुदाई की जा चुकी है। यहां करीब 184 टीलें हंै। सिरपुर में देश की पहली वेद पाठशाला मिली है। इसके अलावा यहां हिन्दू, जैन, बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्म के प्रमाण भी मिले हैं। शैव और वैष्णव धर्म के धर्मावलंबियों के बीच की खाई पाटने के लिए इस ऐतिहासिक स्थल पर छह हरिहर मंदिर भी प्राप्त हुए हैं। खुदाई के दौरान अब तक यहां 18 मंदिर, 8 बुद्ध विहार और 3 जैन मंदिर मिले हैं। एक बड़ा महल और प्रधानमंत्री निवास भी प्राप्त हुआ है। सिरपुर में महानदी धनुष का आकार लिए है। इस उत्खनन में एक महत्वपूण बात यह भी सामने आई है कि सिरपुर एक पूर्ण विकसित नगर होने के साथ ही बड़ा शैक्षणिक व्यापारिक और आयुर्वेदिक केन्द्र भी था। पूर्णत: वास्तु के अनुरूप बने इस नगर में कई आर्युेदिक स्नानागार भी मिले हैं। साथ पूरे नगर में भूमिगत नालियां होना यह सिद्ध करता है कि सिरपुर कितना विकसित है। दुर्भाग्य कि बात है कि सदियों पहले जहां पानी की निकासी के लिए भूमिगत नालियां होती थीं वहीं आज इक्कीसवीं सदी में राजधनी रायपुर के लोग इस सुविधा से वंचित हैं।
सिरपुर के आसपास रहने वालों लोगों में सदियों से एक किदवंती चली आ रही है कि यहां अढ़ाई वर्ष का खर्चा छुपा हुआ है। यहां खर्चा से आशय धन या संपत्ति है। उत्खनन से यह किदवंती सही साबित हुई। दरअसल, पिछले वर्ष खुदाई के दौरान यहां अन्नागार मिले। अब तक 48 अन्नागार प्राप्त हो चुके हैं। इन अनाज भंडारों में इतना अनाज समा सकता है कि अगर ढ़ाई वर्ष तक अकाल पड़े , (ई. पूर्व तीसरी शताब्दी में) तब भी दक्षिण कोसल की जरूरत को पूरा किया जा सकता था। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि सिरपुर का इतना समृद्ध इतिहास होते हुए भी देश-दुनिया के पर्यटकों और विद्यार्थियों को जानकारी देने की कोई पहल संस्कृति विभाग द्वारा नहीं की गई है। यहां जाने वाले पर्यटकों को जानकारी देने के लिए कोई गाईड तब उपलब्ध नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि उत्खनन के दौरान मिली बेशकीमती पुरावस्तुओं को प्रदर्शित करने के लिए अभी तक सिरपुर में कोई संग्रहालय तक नहीं बनाया जा सका। पुरातत्वविद् अरूण कुमार शर्मा ने इस ओर कई बार विभाग के अधिकारियों का ध्यान आकृष्ट भी कराया। वहीं छत्तीसगढ़ में उत्खनन के विशेषज्ञ पुरातत्वविदों की भी कमी है। राज्य के विश्वविद्यालयों में प्राचीन इतिहास तो पढ़ाया जाता है लेकिन आज तक कभी भी पंडित रविशंकर शुक्ल या गुरू घासीदास विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को सिरपुर का भ्रमण नहीं कराया गया, ताकि वे अपने राज्य की इस समृद्ध विरासत को नजदीक से देख और समझ सकें। इसके अलावा उत्खनित स्थलों को जिस लापरपाही से बिना किसी सुरक्षा के छोड़ दिया गया है, वह भी चिंता का विषय है। पुरात्व और संस्कृति विभाग द्वारा मौजूदा वित्त वर्ष में ऐसे स्थलों के अनुरक्षण के लिए 58 लाख रूपए खर्च किए गए हैं, इसके बावजूद इन स्थलों का सौंदर्यीकरण तक नहीं हो सका है। उत्खनन के नाम पर करोड़ों रूपए खर्च कर देने से ही इसे विश्व मानचित्र पर नहीं लाया जा सकता है, इसके लिए स्थलों का उचित रख-रखाव और सौंदर्यीकरण भी आवश्यक है।
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Wednesday, March 10, 2010
कब रूकेगा अंधविश्वासों का सिलसिला ?
कभी टोनही के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित करने तो कभी तंत्र-मंत्र सिध्दियों के लिए मासूमों की बलि देने जैसे क्रूरतम अंधविश्वासों का सिलसिला आखिर कब थमेगा ? विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रण्ाी छत्तीसगढ़ राय में इस तरह की घटनाएं आज भी आम हैं। क्रूरता की पराकाष्ठा पार कर हाल ही सामने आई दो घटनाओं ने एक बार फिर सोचने के लिए झकझोर दिया है कि आखिर हम किस युग में जी रहे हैं। रोती, बिलखती, मौत के बाहों में झूलती जिंदगी भले ही इक्कीसवीं सदी के दसवें पायदान पर आ खड़ी हो गई हो, लेकिन आज के वैज्ञानिक युग में भी अंधविश्वास की पकड़ ढीली नहीं हुई है। धमतरी जिले के एक बैगा ने छह साल के मासूम बच्चे की बलि दे दी। जिला मुख्यालय से मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बंजारी ग्राम के इस बैगा ने बच्चे का गला काटकर उसकी लाश बाड़ी में फेंक दी थी। वहीं राजधानी से सटे टेकारी गांव में एक युवक ने अपनी विधवा भाभी की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी कि उसे उसके टोनही होने का शक था। इसी महीने घटित एक अन्य घटना में दुर्ग जिले के बेरला थाना क्षेत्र में एक गांव के कुछ लोगों द्वारा एक महिला को टोनही के नाम पर आए दिन सरे-राह प्रताड़ित किया जा रहा था। इस मामले में गनीमत इतनी रही कि उस महिला ने समय रहते पुलिस को सूचित कर दिया नहीं तो शायद वह भी अंधविश्वास के ठेकेदारों की दरिंदगी का शिकार हो जाती।
छत्तीसगढ़ में टोनही के आरोप में महिलाओं की प्रताड़ना का दौर कब थमेगा, इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है। राय के पिछड़े अंचलों में टोनही यानि डायन घोषित करके महिलाओं को सरेआम जलील करने और मास हिस्टीरिया की क्रूरतम परिणति के रूप में टोनहियों को मौत के घाट उतार देने की अनेक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं इस प्रदेश के माथे पर कलंक हैं। हालांकि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस कलंक को धोने का भरसर प्रयास किया। छत्तीसगढ़ विधान सभा में 19 जुलाई 2005 का दिन इस .ष्टिकोण से ऐतिहासिक रहा। सरकार के प्रयास से इस दिन टोनही प्रथा उन्मूलन विधेयक 2005 सदन में पारित हुआ। इस कड़े कानून के बनने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि सदियों से चली आ रही इस कुप्रथा के अभिशाप से महिलाओं को मुक्ति मिल जाएगी।
लेकिन इतना कड़ा कानून लाने के बाद भी इस तरह की घटनाओं के बंद होने का सिलसिला थमा नहीं। आखिरकार राय की पुलिस ने भी टोनही प्रथा के खिलाफ लोगों को जागरूक करने और इस कानून की जानकारी देने का बीड़ा उठाया। पिछले वर्ष पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन की पहल पर पुलिस विभाग द्वारा अंधविश्वासों से मुक्त करने के लिए राय के हर गाँव से एक-एक कार्यकर्ता को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई गई। ऐसा कहा गया था कि ये प्रशिक्षित कार्यकर्ता अपने-अपने गाँव में पांरपरिक रूप से प्रचलित अंधविश्वासों, जैसे टोनही, डायन, झाड़-फूँक, धन दोगुना करने की चालाकियों, गड़े धन निकालने, शारीरिक, मानसिक आपदाओं को हल करने के लिए गंडे ताबीज, चमत्कारिक पत्थर एवं छद्म औषधियों का प्रयोग कर धन कमाने वाली गतिविधियों से सचेत करते हुए उनके पीछे की चालाकियों एवं ट्रिक्स की वैज्ञानिक व्याख्या और प्रायोगिक प्रदर्शन करके जनजागरण करेंगे। इस योजना के तहत करीब बीस हजार स्वंसेवी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने का दावा किया गया था, लेकिन पुलिस का यह प्रयास भी खोखला साबित हुआ। अब राय की पुलिस को भी यह सोचना होगा कि आखिर उसके प्रयास में कहां खोट रह गई।
गांवों में ही नहीं शहरों में भी अंधविश्वास की पैठ बहुत गहरे तक है। कुछ वर्ष पहले एक अफवाह फैली रात में डायन के घूमने की, जो प्याज मांगती है और ऐसा नहीं करने पर संतान को खतरा है। इस बे सिर-पैर वाली खबर का असर ऐसा दिखा कि गांवों के अलावा शहरों में यहां तक की राजधानी में भी लोगों ने अपने घर के सामने गोबर से ओम नम: शिवाय तक लिखवा डाला और तो और राय के एक पूर्व वरिष्ठ नेता तथा राय के कर्णधार रहे राजनीतिज्ञ तथा एक मंत्री भी इस काम में पीछे नहीं रहे। सवाल यह उठता है कि क्या अंधविश्वास इस कदर हमारे दिलों-दिमाग में अपनी जड़े जमाए हुए है ? ग्रामीण क्षेत्रों में टोनही के नाम पर हो रही प्रताड़ना को लेकर एक अहम सवाल यह भी खड़ा होता है कि गरीब, मजदूरी करने वाली, विधवा, परित्यक्ता और बेसहारा महिलाएं ही क्यों टोनही का शिकार होती हैं, रसूख वाले घरों की महिलाएं क्यों नहीं ? यह एक अभिशप्त, अशिक्षा तथा गरीबीजन्य त्रासदी है और ऐसी सामाजिक विकृति है जिससे हर ऐसी नारी जूझ रही है। बेसहारा और कमजोर महिलाओं को सताने का औजार है टोनही प्रथा। ताजा हालातों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि केवल कड़ा कानून बना देने या कुछ लोगों को प्रशिक्षण दे देने से ही यह समस्या हल हो जाएगी। इसके लिए शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ लोगों के दिमाग में बैठे अंधविश्वास के भूत को भी निकालना होगा। ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे राय के किसी भी कोने में रहने वाली महिला को यह जानकारी हो सके कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए। साथ ही सरकारी अमला भी ऐसे मामले में गंभीरतापूर्वक त्वरित कार्रवाई करे तभी इस अभिशाप से निपटा जा सकता है।
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छत्तीसगढ़ में टोनही के आरोप में महिलाओं की प्रताड़ना का दौर कब थमेगा, इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है। राय के पिछड़े अंचलों में टोनही यानि डायन घोषित करके महिलाओं को सरेआम जलील करने और मास हिस्टीरिया की क्रूरतम परिणति के रूप में टोनहियों को मौत के घाट उतार देने की अनेक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं इस प्रदेश के माथे पर कलंक हैं। हालांकि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस कलंक को धोने का भरसर प्रयास किया। छत्तीसगढ़ विधान सभा में 19 जुलाई 2005 का दिन इस .ष्टिकोण से ऐतिहासिक रहा। सरकार के प्रयास से इस दिन टोनही प्रथा उन्मूलन विधेयक 2005 सदन में पारित हुआ। इस कड़े कानून के बनने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि सदियों से चली आ रही इस कुप्रथा के अभिशाप से महिलाओं को मुक्ति मिल जाएगी।
लेकिन इतना कड़ा कानून लाने के बाद भी इस तरह की घटनाओं के बंद होने का सिलसिला थमा नहीं। आखिरकार राय की पुलिस ने भी टोनही प्रथा के खिलाफ लोगों को जागरूक करने और इस कानून की जानकारी देने का बीड़ा उठाया। पिछले वर्ष पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन की पहल पर पुलिस विभाग द्वारा अंधविश्वासों से मुक्त करने के लिए राय के हर गाँव से एक-एक कार्यकर्ता को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई गई। ऐसा कहा गया था कि ये प्रशिक्षित कार्यकर्ता अपने-अपने गाँव में पांरपरिक रूप से प्रचलित अंधविश्वासों, जैसे टोनही, डायन, झाड़-फूँक, धन दोगुना करने की चालाकियों, गड़े धन निकालने, शारीरिक, मानसिक आपदाओं को हल करने के लिए गंडे ताबीज, चमत्कारिक पत्थर एवं छद्म औषधियों का प्रयोग कर धन कमाने वाली गतिविधियों से सचेत करते हुए उनके पीछे की चालाकियों एवं ट्रिक्स की वैज्ञानिक व्याख्या और प्रायोगिक प्रदर्शन करके जनजागरण करेंगे। इस योजना के तहत करीब बीस हजार स्वंसेवी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने का दावा किया गया था, लेकिन पुलिस का यह प्रयास भी खोखला साबित हुआ। अब राय की पुलिस को भी यह सोचना होगा कि आखिर उसके प्रयास में कहां खोट रह गई।
गांवों में ही नहीं शहरों में भी अंधविश्वास की पैठ बहुत गहरे तक है। कुछ वर्ष पहले एक अफवाह फैली रात में डायन के घूमने की, जो प्याज मांगती है और ऐसा नहीं करने पर संतान को खतरा है। इस बे सिर-पैर वाली खबर का असर ऐसा दिखा कि गांवों के अलावा शहरों में यहां तक की राजधानी में भी लोगों ने अपने घर के सामने गोबर से ओम नम: शिवाय तक लिखवा डाला और तो और राय के एक पूर्व वरिष्ठ नेता तथा राय के कर्णधार रहे राजनीतिज्ञ तथा एक मंत्री भी इस काम में पीछे नहीं रहे। सवाल यह उठता है कि क्या अंधविश्वास इस कदर हमारे दिलों-दिमाग में अपनी जड़े जमाए हुए है ? ग्रामीण क्षेत्रों में टोनही के नाम पर हो रही प्रताड़ना को लेकर एक अहम सवाल यह भी खड़ा होता है कि गरीब, मजदूरी करने वाली, विधवा, परित्यक्ता और बेसहारा महिलाएं ही क्यों टोनही का शिकार होती हैं, रसूख वाले घरों की महिलाएं क्यों नहीं ? यह एक अभिशप्त, अशिक्षा तथा गरीबीजन्य त्रासदी है और ऐसी सामाजिक विकृति है जिससे हर ऐसी नारी जूझ रही है। बेसहारा और कमजोर महिलाओं को सताने का औजार है टोनही प्रथा। ताजा हालातों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि केवल कड़ा कानून बना देने या कुछ लोगों को प्रशिक्षण दे देने से ही यह समस्या हल हो जाएगी। इसके लिए शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ लोगों के दिमाग में बैठे अंधविश्वास के भूत को भी निकालना होगा। ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे राय के किसी भी कोने में रहने वाली महिला को यह जानकारी हो सके कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए। साथ ही सरकारी अमला भी ऐसे मामले में गंभीरतापूर्वक त्वरित कार्रवाई करे तभी इस अभिशाप से निपटा जा सकता है।
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Tuesday, February 9, 2010
करोड़पति गांव के गरीब लोग
खरोरा के हर तीसरे व्यक्ति के पास है पैन कार्ड
(खरोरा गांव का दौरा कर संजय दुबे की रिपोर्ट)
रायपुर। कृषि सचिव बी.एल. अग्रवाल के ठिकानों पर पड़े आयकर छापे के दौरान रातों-रात चर्चा में आया खरोरा करोड़पतियों का गांव निकला। गरीबी और तंगहाली में जिंदगी गुजार रहे लोगों को जब पता चला कि उनके नाम लाखों-करोड़ों रूपए हैं तो उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। अब ग्रामीणों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या ये रकम उन्हें मिल सकती है। जब इस गांव का दौरा किया तो कई चौकाने वाली जानकारियां भी मिली। इस गांव के औसतन हर तीसरे व्यक्ति का पैन काडऱ् बना हुआ है और उन्हें नहीं पता कि इसका इस्तेमाल कौन लोग, किस मकसद से कर रहे हैं। कृषि सचिव के सीए सुनील अग्रवाल के पास से मिले ग्रामीणों के 220 पैन कार्ड और बैंक खातों की जानकारी तो आयकर छापे में मिल गई। ग्रामीणों के मुताबिक ये कार्ड सुनील के सहयोगी आलोक अग्रवाल ने उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर बनवाए थे। इसके अलावा अभी भी इस गांव में करीब 2 हजार लोगों के पैनकार्ड होने की बात सामने आ रही है। ग्रामीण इस बारे में ज्यादा कुछ बताने से कतरा रहे हैं। हालांकि वे स्वीकार करते हैं उनका पैन बना है जो कुछ ठेकेदारों ने बनवाए थे। एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शराब ठेकेदारों ने गांव के अधिकांश लोगों के पैन कार्ड बनवाएं हैं और इसकी एवज में उन्हें 5 हजार रूपए भी मिले थे। ऐसी जानकारी मिली है कि ठेकेदारों द्वारा आबकारी ठेकों और खदान निविदाओं में इनका इस्तेमाल किया जा रहा है।
नहीं देखा ऐसा गांव -मुख्य आयकर आयुक्त
मुख्य आयकर आयुक्त जमील अहमद से जब बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि विभाग को सुनील अग्रवाल के पास से मिले पैन कार्डों के अलावा अन्य कार्डों की जानकारी नहीं है। हालांकि उन्होंने इस गांव में इतनी बड़ी संख्या में पैन कार्ड होने की संभावना से इंकार भी नहीं किया। मुख्य आयकर आयुक्त ने इस बात पर आश्यर्च जताते हुए कहा कि अपनी सर्विस के दौरान उन्होंने ऐसा गांव नहीं देखा जहां इतनी अधिक संख्या में लोगों के पास पैन नंबर मिले हों। कुछ लोग किस तरह करों की हेराफेरी करते हैं इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि गत वर्ष दिसंबर में बैंकों की इंक्वायरी के दौरान एक खाते में एक पखवाड़े के भीतर सवा दो करोड़ रूपए जमा करने का मामला सामने आया। संबंधित बैंक के मैनेजर से पूछताछ की गई तो पता चला कि यह खाता किसी बढ़ई का है और पूछताछ के डर से वह कहीं भाग गया। जब इस मामले की और गहराई से जांच की गई तो यह जानकारी मिली कि बिलासपुर का एक ठेकेदार अपने कारपेंटर के नाम खाता खुलवाकर स्वंय उसे संचालित करता था। बाद में उस ठेकेदार ने 2 करोड़ रूपए सरेंडर किया। श्री अहमद ने इस आशंका से इंकार नहीं किया कि ग्रामीणों के भोलेपन और सही जानकारी नहीं होने का फायदा कुछ शातिर दिमाग लोग उठाते हैं।
पुजारी और मोची को भी नहीं छोड़ा
खरोरा गांव में लोगों के पास मतदाता परिचय पत्र या ड्राईविंग लाइसेंस की तरह पैन कार्ड हैं। बताया जा रहा है सुनील का सहयोगी आलोक अग्रवाल जो इसी गांव का निवासी है, उसने ग्रामीणों को सब्जबाग दिखाकर बड़ी संख्या में कार्ड बनवाएं हैं। खरोरा में पैन कार्ड केवल कुछ किसानों के पास ही नहीं है बल्कि चाय-पान ठेला लगाने वाले, टैक्सी चलाने वाले और छोटे-छोटे व्यवसाय करने वालों के पास भी है। सुनील के पास से मिले कार्डों में एक विकलांग युवक भोला यादव का भी नाम है। बकरी चराकर अपना और अपने परिवार का पेट पालने वाले इस युवक ने बताया कि उसे जानकारी मिली है उसके खाते में करीब सवा करोड़ रूपए है। इस गोरखधंधे में शामिल लोगों ने जूता-चप्पल सिलने वाले मोची और हनुमान मंदिर के पुजारी धनंजय शर्मा को भी नहीं बख्शा और इन लोगों के भी पैन कार्ड बनावा दिए गए। इनके बैंक और डीमेट खातों में भी पचास लाख रूपए से अधिक की राशि और शेयर होने की जानकारी उन्हें मिली है।
कुछ और गांवों में भी बने हैं पेनकार्ड
खरोरा चौक पर चाय की दुकान चलाने वाले संजय यादव ने बताया कि आलोक अग्रवाल ने ही यहां सबसे पहले पैन कार्ड बनवाने का सिलसिला शुरू किया। इसके लिए उसने लोगों से कई दस्तावेजों की फोटोकापी ली और फार्म भी भरवाया। एक दूसरे की देखादेखी अन्य लोगों ने भी कार्ड बनवाना शुरू कर दिया। इसके बाद तो कुछ अन्य ठेकेदारों ने भी बड़ी संख्या में कार्ड बनवाए। गांव के एक अन्य युवक प्रेम सेन का कहना था कि इसके लिए ठेकेदारों ने जब पांच हजार रूपए दिए तब तो लोग स्वयं ही आगे आकर पैन कार्ड बनवाने लगे। इस युवक ने यह भी बताया कि खरोरा के आसपास के कुछ और गांवों में भी ठेकेदारों ने लोगों के कार्ड बनवाएं हैं। वहीं गांव के सेवकराम, तोरन यादव और राजिव यादव का कहना था, आयकर विभाग उन्हें यह जानकारी दे कि ं उनके नाम से आरोपियों ने कहीं लोन तो नहीं लिया है। हालांकि आयकर विभाग ने यह स्पष्ट किया है पेनकार्ड मामले में सामान्य पूछताछ के अलावा ग्रामीणों पर अन्य किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की जाएगी।
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(खरोरा गांव का दौरा कर संजय दुबे की रिपोर्ट)
रायपुर। कृषि सचिव बी.एल. अग्रवाल के ठिकानों पर पड़े आयकर छापे के दौरान रातों-रात चर्चा में आया खरोरा करोड़पतियों का गांव निकला। गरीबी और तंगहाली में जिंदगी गुजार रहे लोगों को जब पता चला कि उनके नाम लाखों-करोड़ों रूपए हैं तो उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। अब ग्रामीणों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या ये रकम उन्हें मिल सकती है। जब इस गांव का दौरा किया तो कई चौकाने वाली जानकारियां भी मिली। इस गांव के औसतन हर तीसरे व्यक्ति का पैन काडऱ् बना हुआ है और उन्हें नहीं पता कि इसका इस्तेमाल कौन लोग, किस मकसद से कर रहे हैं। कृषि सचिव के सीए सुनील अग्रवाल के पास से मिले ग्रामीणों के 220 पैन कार्ड और बैंक खातों की जानकारी तो आयकर छापे में मिल गई। ग्रामीणों के मुताबिक ये कार्ड सुनील के सहयोगी आलोक अग्रवाल ने उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर बनवाए थे। इसके अलावा अभी भी इस गांव में करीब 2 हजार लोगों के पैनकार्ड होने की बात सामने आ रही है। ग्रामीण इस बारे में ज्यादा कुछ बताने से कतरा रहे हैं। हालांकि वे स्वीकार करते हैं उनका पैन बना है जो कुछ ठेकेदारों ने बनवाए थे। एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शराब ठेकेदारों ने गांव के अधिकांश लोगों के पैन कार्ड बनवाएं हैं और इसकी एवज में उन्हें 5 हजार रूपए भी मिले थे। ऐसी जानकारी मिली है कि ठेकेदारों द्वारा आबकारी ठेकों और खदान निविदाओं में इनका इस्तेमाल किया जा रहा है।
नहीं देखा ऐसा गांव -मुख्य आयकर आयुक्त
मुख्य आयकर आयुक्त जमील अहमद से जब बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि विभाग को सुनील अग्रवाल के पास से मिले पैन कार्डों के अलावा अन्य कार्डों की जानकारी नहीं है। हालांकि उन्होंने इस गांव में इतनी बड़ी संख्या में पैन कार्ड होने की संभावना से इंकार भी नहीं किया। मुख्य आयकर आयुक्त ने इस बात पर आश्यर्च जताते हुए कहा कि अपनी सर्विस के दौरान उन्होंने ऐसा गांव नहीं देखा जहां इतनी अधिक संख्या में लोगों के पास पैन नंबर मिले हों। कुछ लोग किस तरह करों की हेराफेरी करते हैं इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि गत वर्ष दिसंबर में बैंकों की इंक्वायरी के दौरान एक खाते में एक पखवाड़े के भीतर सवा दो करोड़ रूपए जमा करने का मामला सामने आया। संबंधित बैंक के मैनेजर से पूछताछ की गई तो पता चला कि यह खाता किसी बढ़ई का है और पूछताछ के डर से वह कहीं भाग गया। जब इस मामले की और गहराई से जांच की गई तो यह जानकारी मिली कि बिलासपुर का एक ठेकेदार अपने कारपेंटर के नाम खाता खुलवाकर स्वंय उसे संचालित करता था। बाद में उस ठेकेदार ने 2 करोड़ रूपए सरेंडर किया। श्री अहमद ने इस आशंका से इंकार नहीं किया कि ग्रामीणों के भोलेपन और सही जानकारी नहीं होने का फायदा कुछ शातिर दिमाग लोग उठाते हैं।
पुजारी और मोची को भी नहीं छोड़ा
खरोरा गांव में लोगों के पास मतदाता परिचय पत्र या ड्राईविंग लाइसेंस की तरह पैन कार्ड हैं। बताया जा रहा है सुनील का सहयोगी आलोक अग्रवाल जो इसी गांव का निवासी है, उसने ग्रामीणों को सब्जबाग दिखाकर बड़ी संख्या में कार्ड बनवाएं हैं। खरोरा में पैन कार्ड केवल कुछ किसानों के पास ही नहीं है बल्कि चाय-पान ठेला लगाने वाले, टैक्सी चलाने वाले और छोटे-छोटे व्यवसाय करने वालों के पास भी है। सुनील के पास से मिले कार्डों में एक विकलांग युवक भोला यादव का भी नाम है। बकरी चराकर अपना और अपने परिवार का पेट पालने वाले इस युवक ने बताया कि उसे जानकारी मिली है उसके खाते में करीब सवा करोड़ रूपए है। इस गोरखधंधे में शामिल लोगों ने जूता-चप्पल सिलने वाले मोची और हनुमान मंदिर के पुजारी धनंजय शर्मा को भी नहीं बख्शा और इन लोगों के भी पैन कार्ड बनावा दिए गए। इनके बैंक और डीमेट खातों में भी पचास लाख रूपए से अधिक की राशि और शेयर होने की जानकारी उन्हें मिली है।
कुछ और गांवों में भी बने हैं पेनकार्ड
खरोरा चौक पर चाय की दुकान चलाने वाले संजय यादव ने बताया कि आलोक अग्रवाल ने ही यहां सबसे पहले पैन कार्ड बनवाने का सिलसिला शुरू किया। इसके लिए उसने लोगों से कई दस्तावेजों की फोटोकापी ली और फार्म भी भरवाया। एक दूसरे की देखादेखी अन्य लोगों ने भी कार्ड बनवाना शुरू कर दिया। इसके बाद तो कुछ अन्य ठेकेदारों ने भी बड़ी संख्या में कार्ड बनवाए। गांव के एक अन्य युवक प्रेम सेन का कहना था कि इसके लिए ठेकेदारों ने जब पांच हजार रूपए दिए तब तो लोग स्वयं ही आगे आकर पैन कार्ड बनवाने लगे। इस युवक ने यह भी बताया कि खरोरा के आसपास के कुछ और गांवों में भी ठेकेदारों ने लोगों के कार्ड बनवाएं हैं। वहीं गांव के सेवकराम, तोरन यादव और राजिव यादव का कहना था, आयकर विभाग उन्हें यह जानकारी दे कि ं उनके नाम से आरोपियों ने कहीं लोन तो नहीं लिया है। हालांकि आयकर विभाग ने यह स्पष्ट किया है पेनकार्ड मामले में सामान्य पूछताछ के अलावा ग्रामीणों पर अन्य किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की जाएगी।
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Tuesday, December 29, 2009
भेंटवार्ता: गणेश शंकर मिश्र, आयुक्त वाणिज्यिक कर
पत्रकार संजय दुबे द्वारा छत्तीसगढ़ के वाणिज्यिक कर आयुक्त से की 19 दिसंबर 2009 को की गई विशेष भेंटवार्ता।
मिश्र जी आपकी प्रशासनिक कार्यप्रणाली में ऐसी कौन सी बात है कि आप जहां भी रहते हैं वह समय वहां के लिए आदर्श और इतिहास बन जाता है ?
शासकीय योजनाओं और नीतियों का क्रियान्वयन इस तरह से किया जाना कि आम आदमी व सर्वहारा वर्ग उससे जुड़ जाए। किसी भी योजना का क्रियान्वयन हम जब उसको धरातल तक पहुंचाकर करना चाहते हैं तो ये चीजें बहुत आवश्यक होती हैं। ब्रिटिश काल में प्रशासनिक अधिकारी जनता से दूरी बनाकर चलते थे, लेकिन अब प्रशासन जनता से जुड़कर कार्य करता है। जनकल्याण के लिए जरूरी है कि अधिकारी लोगों से सामंजस्य बनाकर चलें, यदि ऐसा नहीं होने पर किसी भी योजना का क्रियान्वयन शत-प्रतिशत उसकी भावना के अनुरूप हो पाना संभव नहीं है। आम नागरिकों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करके ही शासकीय नीतियों और योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो सकता है। अनावश्यक रूप से या कृत्रिम ढंग से बनाई गई दूरी का स्पष्ट प्रभाव योजनाओं की सफलता पर पड़ता है। यदि कोई अधिकारी आम लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए तत्पर रहता है तो लोगों के बीच इसका अच्छा संदेश जाता है और शासन की अच्छी छवि निर्मित होती है। यही कारण है कि अच्छा कार्य करने वाले अधिकारी को लोग याद रखते हैं।
आप छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र हैं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के सुपुत्र हैं। अपने पिता को आपने किस स्वरूप में जीवन का आदर्श बनाया ? उनकी स्मृति में राज्य में कौन-कौन से कार्य चल रहे हैं ? उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ बताएं।
मेरे पिताजी जीवन में विपरित परिस्थितियों का समना करते हुए अपने आदर्शों पर दृढ़ता से कायम रहे। आज सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि विपरित परिस्थितियों में बहुत से लोग अपने सिद्धांतों और जीवन शैली के बारे में कई बार समझौता कर लेते हैं। उन्होंने हमेशा विपरित परिस्थितियों को स्वीकार किया, उसका सामना किया और संघर्ष करते रहे लेकिन अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। उनके व्यक्तित्व के इस पहलु को मैं अपने लिए आदर्श मानता हूं और इससे मुझे हमेशा प्रेरणा मिलती रहती है। जब भी कभी विपरित परिस्थितियां आती हैं और ऐसा लगता है कि आगे का रास्ता अंधकारमय है ऐसे में पिताजी की स्मृति एक आत्मिक बल और प्रेरणा प्रदान करती है। पिताजी जबतक जीवित रहे उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में न तो अपना नाम जुड़वाया और न ही उन्होंने इसका कोई लाभ अपने या अपने परिवार के लिए लिया। उनके स्वर्गवास होने के पश्चात् शासन ने स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को देखते हुए शासन ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित करते हुए उनका नाम जोड़ा था। सरकार ने उनके नाम पर पं. रविशंकर शुक्ल विश्विद्यालय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लखनलाल मिश्र शोध पीठ की स्थापना की। मेरी जानकारी में संभवत: किसी स्वतंत्रता संग्राम के नाम पर देश की यह पहली शोध पीठ है। इसमें छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले ऐसे लोग जिनको लोगों ने भुला दिया है ऐसे लोगों की जानकारी एकत्रित करना और भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में उनके योगदान को रेखांकित करना, इस शोध पीठ का उद्देश्य है। इसके अलावा रायपुर नगर निगम द्वारा एक व्यावसायिक परिसर का नामकरण भी पिताजी के नाम पर किया गया है। रायपुर जिले के तिल्दा के पास पैतृक गांव मुरा में जलसंसाधन विभाग का तालाब है उसका नामकरण भी शासन ने पिताजी के नाम पर किया है।
पिताजी दुर्ग थाने के प्रभारी थे। इसी दौरान 15 दिसंबर 1945 को तात्कालीन आईसीएस अधिकारी आर.के. पाटिल महात्मा गांधी के आह्वान पर शासकीय सेवा से इस्तीफा देकर नागपुर जा रहे थे और दुर्ग रेलवे स्टेशन में जब उनकी ट्रेन रूकी तब वहां कांग्रेसी स्वराजी नेताओं का जमावड़ा लगा हुआ था। पिताजी वहां ड्यूटी पर तैनात थे और पुलिस की वर्दी में श्री पाटिल को सैल्यूट किया और कांग्रेसी नेताओं से सूत की माला लेकर उन्हें पहनाते हुए कहा कि मैं आपके रास्ते पर आ रहा हूं। उन्होंने महात्मा गांधी और भारत माता की जय का घोष भी किया। इस घटना को ब्रिटिश सरकार ने शासन के साथ खुले रूप से विद्रोह के रूप में लिया और उनसे स्पष्टीकरण मांगते हुए खेद व्यक्त करने को कहा। लेकिन पिताजी को यह स्वीकार नहीं था कि वे महात्मा गांधी और भारत माता की जय कहने के कारण खेद व्यक्त करते और परिणामस्वरूप उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
आप कवर्धा में रहे वहां आपने किस समस्या को ज्यादा गंभीरता से लिया ? राजनांदगांव कलेक्टर रहते हुए आपने कई उपलब्धियां हासिल की। खासकर बाल विवाह रोकने और ग्रामीण स्वच्छता अभियान में आपने जो सफलता अर्जित की उसका विवरण जिसके लिए आप राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित भी हुए ।
कवर्धा में मैं 1987 से 1990 तक अनुविभागीय अधिकारी के रूप में पदस्थ था। उस समय कवर्धा जिला नहीं बना था। इस दौरान वहां परिवार कल्याण शिविर का आयोजन किया गया जो उस समय देश का सबसे बड़ा शिविर माना गया था। उसमें 1500 आपरेशन किए गए थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि कवर्धा में जो महात्मा गांधी का चौक है और जहां जयस्तंभ बना हुआ है वह पूरा क्षेत्र अतिक्रमण से भरा हुआ था, जो शहर का हृदय स्थल था। सबसे ज्यादा परेशानी 15 अगस्त और 26 जनवरी को ध्वजारोहण के दौरान होती थी। जगह नहीं होने से प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। इसके अलावा कानून व्यवस्था की समस्याएं भी खड़ी होती थी। हम लोगों ने उस क्षेत्र के लोगों को समझा कर लोगों की सहमति से 500 से ज्यादा अतिक्रमण हटवाए और करीब 25 करोड़ रूपए की जमीन को बेजा कब्जों से मुक्त कराया। वहां के व्यवसायियों को दूसरे स्थान पर जगह देकर बसाया गया जो कि अभी भी कवर्धा में नवीन बाजार के नाम से स्थापित है। इसके अलावा महात्मा गांधी मैदान में जयस्तंभ और शंकराचार्य के चबूतरे को चारों तरफ से घेर करके उसका सौंदर्यीकरण किया गया। यह बहुत बड़ा कार्य था और इसे पूरा करके मुझे बहुत संतोष प्राप्त हुआ।
राजनांदगांव में मैं दिसंबर 2003 से लेकर जून 2006 तक कलेक्टर रहा। वहां की सबसे बड़ी समस्या बाल विवाह कुरीति को लेकर थी। वहां पर इस दौरान एक अभियान चलाया गया और इसमें आम लोगों को भी जोड़ा गया। जनप्रतिनिधियों के अलावा इसमें साहू , कुर्मी, पटेल, सतनामी आदि समाज के लोगों को इसमें शामिल किया गया। समाज के लोगों के साथ बैठक ली और गांव-गांव में प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारी व जनप्रतिनिधियों की टीम बना करके ऐसी व्यवस्था की गई कि कहीं पर भी यदि बाल विवाह होता है तो तत्काल इसकी सूचना कलेक्टर को दें। इसके लिए जिला स्तर पर एक कंट्रोल रूम बनाया गया था और उसके टेलीफोन नम्बर को पूरे जिले में प्रचारित किया गया था। इस सामाजिक कुरीति को खत्म करने के लिए जनआंदोलन का स्वरूप दिया गया था और इसका इतना अच्छा परिणाम सामने आया। अगर कहीं बालविवाह होता भी तो खबर मिलती थी कि लोगों ने घर के अंदर लाईट बंद करके और ताला लगाकर बाल विवाह किया। इससे पहली बार लोगों के बीच यह संदेश गया कि बाल विवाह भी एक सामाजिक और कानूनी बुराई है। सन् 1930 से बाल विवाह निरोधक अधिनियम बना हुआ है लेकिन पहले कभी इसके क्रियान्वयन की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया था और इसका परिणाम यह रहा कि करीब 1000 बाल विवाह को रोका गया। राजनांदगांव कलेक्टर रहते हुए मैंने यह दावा किया था कि मेरे जिले में एक भी बाल विवाह नहीं हो रहा है और आज किसी भी जिले में कोई कलेक्टर इस तरह का दावा करने की स्थिति में नहीं है। इसी तरह संपूर्ण स्वच्छता अभियान में पहली बार राजनांदगांव जिले की 13 ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम का दर्जा देते हुए राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया गया। राजनांदगांव ही प्रदेश का पहला ऐसा जिला था जिसे यह पुरस्कार मिला। इसके बाद राज्य के अन्य जिलों में भी इस दिशा में कार्य हुए।
आपने बस्तर में भी कई योजनाएं चलाईं, वहां का अनुभव क्या रहा ? नक्सलवाद होने के बावजूद आपने वहां सफलता के झंडे गाड़े। इसकी विस्तृत जानकारी।
राजनांदगांव में जिस तरह संपूर्ण स्वच्छता अभियान का कार्य किया था वहीं बस्तर में यह कार्य काफी कठिन था क्योंकि राजनांदगांव ऐसा जिला है जहां साक्षरता सबसे अधिक है वहीं बस्तर में साक्षरता सबसे कम है। दूसरा राजनांदगांव जहां मैदानी जिला है, आवागमन के साधन अच्छे हैं वहीं, बस्तर वनाच्छादित, दुर्गम और जंगल के बीच बसा जिला है, जहां नक्सलवाद की समस्या भी व्याप्त है। इसलिए वहां शासकीय नीतियों और योजनाओं का क्रियान्वयन अन्य जिलों की तुलना में अधिक कठिन व चुनौतिपूर्ण रहता है। लेकिन यहां भी हमने ग्रामीण लोगों से मिलकर और पंचायत प्रतिनिधियों का सहयोग लेते हुए संपूर्ण स्वच्छता अभियान को क्रियान्वित किया। बस्तर क्षेत्र में दूषित पानी पीने से जनजनित बीमारियां अन्य जगहों की तुलना में अधिक थी। ऐसी स्थिति में वहां इस योजना का क्रियान्वयन किया जाना बहुत आवश्यक था। साफ-सफाई के प्रति भी वहां लोगों में जागरूकता कम है और इसका मूल कारण लोगों में साक्षरता की कमी है। बस्तर में मैं 15 जून 2006 से 14 अप्रैल 2008 तक कलेक्टर रहा। इस दौरान मैंने इस अभियान में तेजी लाने का प्रयास किया और इसका परिणाम यह रहा कि यहां की 27 ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम घोषित किया गया और इन्हें भी राष्ट्रपति के द्वारा पुरस्कृत किया गया। उस वर्ष पूरे प्रदेश में बस्तर ही एकमात्र ऐसा जिला था जहां सर्वाधिक ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम का पुरस्कार दिया गया था। दूसरी एक महत्वपूर्ण समस्या जगदलपुर शहर में जनसंख्या का दबाव बढऩे और अतिक्रमण के कारण शहर का चेहरा विकृत हो जाना थी। इसके सुधार के लिए एक योजना बनाकर और लोगों से चर्चा कर शहर के सात प्रमुख मार्गों से अतिक्रमण हटाने का कार्य किया। सड़क के किनारे स्थित धार्मिक स्थलों को हटाना कठिन कार्य था इसके लिए सभी धर्मों के पुजारियों के साथ बैठक की गई और उनसे सहयोग मांगा गया। इस तरह से मार्ग पर आने वाले 15 धार्मिक स्थलों को स्वेच्छा से हटाया गया, जो बहुत पुराने थे और यातायात को प्रभावित कर रहे थे। इसके साथ ही करीब 11 करोड़ रूपए की एक परियोजना बनाकर सड़कें और नालियां बनाई गईं और वृक्षारोपण किया गया। अतिक्रमण हटाओं अभियान की सफलता यह रही कि 1000 से अधिक लोगों ने स्वेच्छापूर्वक अतिक्रमण हटा लिये। वहां एक और प्रयोग किया गया शहर के चौक-चौराहों पर किसी महापुरूष की प्रतिमां लगाने के स्थान पर बस्तर की कला और संस्कृति को प्रदर्शित करने वाली कलाकृतियां लगाईं गई ताकि पर्यटक बस्तर की कला और संस्कृति को जान सकें। शहर के सात चौराहों का जो सौंदर्यीकरण हुआ उसका पूरे प्रदेश में सराहना हुई और शासन ने इस तरह के कार्य अन्य जिलों में भी करने को कहा। एक और महत्वपूर्ण कार्य जो बस्तर में हुआ वह है औद्योगिकरण। औद्योगिकरण की दृष्टि से यह जिला पिछड़ा था। बस्तर में टाटा स्टील का 5 मिलियन टन क्षमता वाले इस्पात संयंत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके लिए आसपास के दस गांवों में करीब 5 हजार एकड़ जमीन का भू-अर्जन की कार्रवाई को सफलतापूर्वक संपन्न कराया और 35 करोड़ से ज्यादा की राशि प्रभावित ग्रामीणों को वितरित की गई। इसके लिए नगरनार में बनने वाले एनएमडीसी के संयंत्र के लिए भी आवश्यक कार्रवाई की गई। एक और समस्या थी कि बस्तर कलेक्ट्रेट में कर्मचारी देर से कार्यलय आते थे। इसके अलावा यह भी शिकायत थी कि कुछ लोग कभी-कभी शराब पीकर भी कार्यलय आ जाते थे। इस स्थिति को देखते हुए बस्तर कलेक्ट्रेट को सेवासदन के रूप में विकसित किया गया। 1 जनवरी 2008 से स्थिति यह है कि कलेक्टर से लेकर सभी अधिकारी, कर्मचारी प्रतिदिन निर्धारित समय पर एक जगह इक_े होकर गांधीजी का प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जे पीर पराई जाणे रेÓ का गान करते हैं उसके बाद काम की शुरूआत होती है। इसका असर यह हुआ कि जो कर्मचारी शराब पीकर कार्यलय आते थे उन्होंने शराब पीना बंद कर दिया है। इसे मैं प्रशासन में किया गया बहुत बड़ा सफल प्रयोग मानता हूं।
आप उद्योग विभाग में भी रहे, उसके पहले रायपुर नगर निगम में प्रशासक। आज यह शहर छत्तीसगढ़ की राजधानी है इसका गौरव और बड़े इसके लिए क्या प्रयास होने चाहिए ?
जब मैं रायपुर नगर निगम का प्रशासक था तब यह व्यवस्था की थी कि पेयजल, प्रकाश और साफ-सफाई की ओर विशेष ध्यान दिया जाए। मैं सोचता हूं कि यदि तीन चीजों पर ध्यान दिया जाए तो आम आदमी की अस्सी से नब्बे प्रतिशत समस्याओं का ऐसे ही समाधान हो जाता है। मैंने ये प्रयास किया था कि हर जोन के अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में सफाई व्यवस्था देखें, बिजली व्यवस्था देखें और पेयजल व्यवस्था पर सतत नजर रखें। जोन के अधिकारियों को यह निर्देश भी दिया गया था कि वे रात में अपने क्षेत्रों में घूमकर यह देखें कि कितने खंभों में लाईट जल रही, कितने में नहीं। इसी प्रकार सफाई व्यवस्था देखने को भी कहा गया था। शहर के विकास में अतिक्रमण एक बड़ी समस्या थी जो अभी भी है। अपने छह माह के कार्यकाल के दौरान मैंने करीब 1000 अतिक्रमण हटवाए। उस समय पहली बार रायपुर में धार्मिक स्थलों को तोड़ा गया था, जो अवैध थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में वृक्षारोपण करवाया गया। वर्तमान समय में समग्र योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन करने की आवश्यकता है।
आपको अतिक्रमण हटाओ अभियान का जुनून सा रहा है। बसाओ अभियान के लिए भी क्या ऐसा ही कुछ होता रहा है ?
अतिक्रमण हटाओ अभियान तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक प्रभावित लोगों के लिए समुचित व्यवस्था न की जाए, चाहे वह अतिक्रमण रिहाईशी हो या व्यवसायिक हो। दोनों की प्रकार के अतिक्रमण हटाने के पहले जो लोग प्रभावित हो रहे हैं उनकी बातों को सुनना पड़ेगा, उनकी समस्याओं पर विचार करना पड़ेगा जो भी यथासंभव मदद वैकल्पिक बसाहट के रूप में आवश्यक हो व उचित हो वह उन्हें देना चाहिए। जहां भी मैंने अतिक्रमण अभियान चलाया वहां कहीं भी ये स्थिति नहीं हुई है कि कभी कोई कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो। मैंने जब भी अभियान चलाया उसमें खासबात यह रही जिन लोगों का अतिक्रमण तोड़ा गया उन्होंने स्वंय इस कार्य में सहयोग प्रदान किया। बस्तर में हमने इतनी बड़ी संख्या में अतिक्रमण हटाए लेकिन कोई भी व्यक्ति कोर्ट नहीं गया और न ही किसी ने मुआवजे की मांग की। यदि अतिक्रमण हटाने के कार्य में बड़े और छोटे लोगों का भेदभाव न किया जाए तो लोगों का पूरा सहयोग रहता है और इससे अच्छा संदेश जाता है। नियत साफ हो और बिना किसी पक्षपात के ईमानदारी से काम किया जाए तो लोगों का विश्वास और सहयोग हासिल किया जा सकता है। हमने जहां-जहां अतिक्रमण हटाए लोगों की वैकल्पिक बसाहट का प्रयास किया है।
वाणिज्यिक कर विभाग द्वारा इस वर्ष कर वसूली की क्या स्थिति रही है ?
इस वित्तीय वर्ष में 30 नवंबर तक की स्थिति में विभाग की वृद्धि दर करीब 3 प्रतिशत है। इसका अर्थ है विभाग ने नवंबर तक पिछले वर्ष की तुलना में 3 प्रतिशत अधिक वसूली की है। आथिक मंदी के चलते वसूली प्रभावित न हो इसके लिए विभाग द्वारा समुचित प्रयास किए जा रहे हैं।
सर्वाधिक राजस्व वसूली किस क्षेत्र से होती है ?
सर्वाधिक टेक्स वसूली भिलाई स्टील प्लांट, बालको, प्रकाश स्पंज आयरन, एसईसीएल और अन्य बड़ी कंपनियों के माध्यम से होती है। इसके अलावा पेट्रोल कंपनियां हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो इस्पात, कोयला, पेट्रोल और खनिज आधारित उद्योगों से सर्वाधिक राजस्व वसूली होती है।
सेल टेक्स चोरी करने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है ?
ऐसे क्षेत्र जहां सेल टेक्स चोरी की आशंका रहती है इसके लिए प्रवर्तन विंग गठित है। इसके लिए पूरे राज्य में दो उपायुक्त हैं जो स्थिति पर नजर रखते हैं। इनमें से एक का मुख्यालय रायपुर और एक का बिलासपुर में है। रिर्टन के आधार पर जिन संस्थानों पर शक होता है उन पर छापे की कार्रवाई की जाती है।
विभाग द्वारा उपभोक्ता जागरण पुरस्कार योजना शुरू की गई थी इसका कैसा प्रतिसाद रहा ?
उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के लिए यह इनामी योजना शुरू की गई थी और लोगों का इसके प्रति अच्छा रूझान देखने को मिला। दुकानदार यदि बिल देता है तो उसे इसका लेखा-जोखा प्रस्तुत करना पड़ता है। सेल टेक्स अप्रत्यक्ष कर है जो डीलर के माध्यम से ही प्राप्त होता है। उपभोक्ता जागरण योजना के तहत ग्राहकों से यह कहा गया था कि वो 500 रुपए से अधिक की जो भी खरीदी करते हैं उसका बिल अवश्य प्राप्त करें। इसके लिए दीपावली का समय चुना गया था इसका कारण है कि इस दौरान सभी लोग खरीददारी करते हैं। इसमें उन वस्तुओं को शामिल किया गया था जिनकी खरीदारी आमतौर पर लोग दीपावली के समय करते ही हैं। यह योजना काफी सफल रही। लगभग 50 हजार बिल लोगों ने ड्राप बाक्स में डाले। इसका सबसे बड़ा फायदा यह रहा कि इस योजना के माध्यम से पहली बार वाणिज्यिक कर विभाग आम उपभोक्ताओं तक पहुंच पाया है। इससे उपभोक्ताओं में यह संदेश गया है कि कोई भी खरीदारी करते समय रसीद अवश्य लेनी चाहिए। विभाग द्वारा प्रदेश के 32 लाख मोबाइल उपभोक्ताओं को एसएमएस के जरिए संदेश भेजकर बताया गया कि जो भी खरीदारी करें उसकी रसीद अवश्य लें।
इस योजना के तहत उपभोक्ताओं को पुरस्कार कब तक दिए जाएंगे ?
चुनाव के कारण राज्य में अभी आदर्श आचार संहिता लागू है। चुनाव संपन्न होने और आचार संहिता समाप्त होने के बाद पुरस्कार देने की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
अवैध शराब की बिक्री रोकने के क्या प्रयास किए जा रहे हैं ?
इसके लिए जांच उडऩदस्ता बनाया गया है। जहां पर शिकायत प्राप्त होती है वहां टीम जाकर कार्रवाई करती है।
केन्द्र सरकार 1 अप्रैल 2010 से गुड्स एण्ड सर्विस टेक्स (जीएसटी) लागू करने जा रही है। इसके लिए विभाग द्वारा क्या तैयारियां की गई हैं ?
जीएसटी का मतलब गुड्स एण्ड सर्विस टेक्स है। जिस तरह पहले सेल टेक्स हुआ करता था उसके बाद वैल्यू एडेड टेक्स आया, इसी कड़ी में जीएसटी है। इसमें कई तरह के करों को एक में ही मिला दिया गया है जैसे मनोरंजन कर, विलासिता कर आदि। इसमें वस्तु और सेवाकर मिला होगा। यह दो प्रकार का होगा एक स्टेट जीएसटी और दूसरा सेंट्रल जीएसटी होगा। इसमें केन्द्र और राज्य अलग-अलग वस्तुओं पर कर लगाएगा। इसमें कुछ नए प्रावधानों को शामिल किया गया है। हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे 1 अप्रैल 2010 की बजाय 1 अप्रैल 2011 से लागू करने की मांग रखी है। अभी इस बारे में अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। इस संबंध में वाणिज्यिक कर विभाग व्यापारियों से चर्चा कर उनकी राय भी जान रहा है और यह प्रक्रिया अभी चल रही है।
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मिश्र जी आपकी प्रशासनिक कार्यप्रणाली में ऐसी कौन सी बात है कि आप जहां भी रहते हैं वह समय वहां के लिए आदर्श और इतिहास बन जाता है ?
शासकीय योजनाओं और नीतियों का क्रियान्वयन इस तरह से किया जाना कि आम आदमी व सर्वहारा वर्ग उससे जुड़ जाए। किसी भी योजना का क्रियान्वयन हम जब उसको धरातल तक पहुंचाकर करना चाहते हैं तो ये चीजें बहुत आवश्यक होती हैं। ब्रिटिश काल में प्रशासनिक अधिकारी जनता से दूरी बनाकर चलते थे, लेकिन अब प्रशासन जनता से जुड़कर कार्य करता है। जनकल्याण के लिए जरूरी है कि अधिकारी लोगों से सामंजस्य बनाकर चलें, यदि ऐसा नहीं होने पर किसी भी योजना का क्रियान्वयन शत-प्रतिशत उसकी भावना के अनुरूप हो पाना संभव नहीं है। आम नागरिकों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करके ही शासकीय नीतियों और योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो सकता है। अनावश्यक रूप से या कृत्रिम ढंग से बनाई गई दूरी का स्पष्ट प्रभाव योजनाओं की सफलता पर पड़ता है। यदि कोई अधिकारी आम लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए तत्पर रहता है तो लोगों के बीच इसका अच्छा संदेश जाता है और शासन की अच्छी छवि निर्मित होती है। यही कारण है कि अच्छा कार्य करने वाले अधिकारी को लोग याद रखते हैं।
आप छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र हैं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के सुपुत्र हैं। अपने पिता को आपने किस स्वरूप में जीवन का आदर्श बनाया ? उनकी स्मृति में राज्य में कौन-कौन से कार्य चल रहे हैं ? उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ बताएं।
मेरे पिताजी जीवन में विपरित परिस्थितियों का समना करते हुए अपने आदर्शों पर दृढ़ता से कायम रहे। आज सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि विपरित परिस्थितियों में बहुत से लोग अपने सिद्धांतों और जीवन शैली के बारे में कई बार समझौता कर लेते हैं। उन्होंने हमेशा विपरित परिस्थितियों को स्वीकार किया, उसका सामना किया और संघर्ष करते रहे लेकिन अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। उनके व्यक्तित्व के इस पहलु को मैं अपने लिए आदर्श मानता हूं और इससे मुझे हमेशा प्रेरणा मिलती रहती है। जब भी कभी विपरित परिस्थितियां आती हैं और ऐसा लगता है कि आगे का रास्ता अंधकारमय है ऐसे में पिताजी की स्मृति एक आत्मिक बल और प्रेरणा प्रदान करती है। पिताजी जबतक जीवित रहे उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में न तो अपना नाम जुड़वाया और न ही उन्होंने इसका कोई लाभ अपने या अपने परिवार के लिए लिया। उनके स्वर्गवास होने के पश्चात् शासन ने स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को देखते हुए शासन ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित करते हुए उनका नाम जोड़ा था। सरकार ने उनके नाम पर पं. रविशंकर शुक्ल विश्विद्यालय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लखनलाल मिश्र शोध पीठ की स्थापना की। मेरी जानकारी में संभवत: किसी स्वतंत्रता संग्राम के नाम पर देश की यह पहली शोध पीठ है। इसमें छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले ऐसे लोग जिनको लोगों ने भुला दिया है ऐसे लोगों की जानकारी एकत्रित करना और भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में उनके योगदान को रेखांकित करना, इस शोध पीठ का उद्देश्य है। इसके अलावा रायपुर नगर निगम द्वारा एक व्यावसायिक परिसर का नामकरण भी पिताजी के नाम पर किया गया है। रायपुर जिले के तिल्दा के पास पैतृक गांव मुरा में जलसंसाधन विभाग का तालाब है उसका नामकरण भी शासन ने पिताजी के नाम पर किया है।
पिताजी दुर्ग थाने के प्रभारी थे। इसी दौरान 15 दिसंबर 1945 को तात्कालीन आईसीएस अधिकारी आर.के. पाटिल महात्मा गांधी के आह्वान पर शासकीय सेवा से इस्तीफा देकर नागपुर जा रहे थे और दुर्ग रेलवे स्टेशन में जब उनकी ट्रेन रूकी तब वहां कांग्रेसी स्वराजी नेताओं का जमावड़ा लगा हुआ था। पिताजी वहां ड्यूटी पर तैनात थे और पुलिस की वर्दी में श्री पाटिल को सैल्यूट किया और कांग्रेसी नेताओं से सूत की माला लेकर उन्हें पहनाते हुए कहा कि मैं आपके रास्ते पर आ रहा हूं। उन्होंने महात्मा गांधी और भारत माता की जय का घोष भी किया। इस घटना को ब्रिटिश सरकार ने शासन के साथ खुले रूप से विद्रोह के रूप में लिया और उनसे स्पष्टीकरण मांगते हुए खेद व्यक्त करने को कहा। लेकिन पिताजी को यह स्वीकार नहीं था कि वे महात्मा गांधी और भारत माता की जय कहने के कारण खेद व्यक्त करते और परिणामस्वरूप उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
आप कवर्धा में रहे वहां आपने किस समस्या को ज्यादा गंभीरता से लिया ? राजनांदगांव कलेक्टर रहते हुए आपने कई उपलब्धियां हासिल की। खासकर बाल विवाह रोकने और ग्रामीण स्वच्छता अभियान में आपने जो सफलता अर्जित की उसका विवरण जिसके लिए आप राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित भी हुए ।
कवर्धा में मैं 1987 से 1990 तक अनुविभागीय अधिकारी के रूप में पदस्थ था। उस समय कवर्धा जिला नहीं बना था। इस दौरान वहां परिवार कल्याण शिविर का आयोजन किया गया जो उस समय देश का सबसे बड़ा शिविर माना गया था। उसमें 1500 आपरेशन किए गए थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि कवर्धा में जो महात्मा गांधी का चौक है और जहां जयस्तंभ बना हुआ है वह पूरा क्षेत्र अतिक्रमण से भरा हुआ था, जो शहर का हृदय स्थल था। सबसे ज्यादा परेशानी 15 अगस्त और 26 जनवरी को ध्वजारोहण के दौरान होती थी। जगह नहीं होने से प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। इसके अलावा कानून व्यवस्था की समस्याएं भी खड़ी होती थी। हम लोगों ने उस क्षेत्र के लोगों को समझा कर लोगों की सहमति से 500 से ज्यादा अतिक्रमण हटवाए और करीब 25 करोड़ रूपए की जमीन को बेजा कब्जों से मुक्त कराया। वहां के व्यवसायियों को दूसरे स्थान पर जगह देकर बसाया गया जो कि अभी भी कवर्धा में नवीन बाजार के नाम से स्थापित है। इसके अलावा महात्मा गांधी मैदान में जयस्तंभ और शंकराचार्य के चबूतरे को चारों तरफ से घेर करके उसका सौंदर्यीकरण किया गया। यह बहुत बड़ा कार्य था और इसे पूरा करके मुझे बहुत संतोष प्राप्त हुआ।
राजनांदगांव में मैं दिसंबर 2003 से लेकर जून 2006 तक कलेक्टर रहा। वहां की सबसे बड़ी समस्या बाल विवाह कुरीति को लेकर थी। वहां पर इस दौरान एक अभियान चलाया गया और इसमें आम लोगों को भी जोड़ा गया। जनप्रतिनिधियों के अलावा इसमें साहू , कुर्मी, पटेल, सतनामी आदि समाज के लोगों को इसमें शामिल किया गया। समाज के लोगों के साथ बैठक ली और गांव-गांव में प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारी व जनप्रतिनिधियों की टीम बना करके ऐसी व्यवस्था की गई कि कहीं पर भी यदि बाल विवाह होता है तो तत्काल इसकी सूचना कलेक्टर को दें। इसके लिए जिला स्तर पर एक कंट्रोल रूम बनाया गया था और उसके टेलीफोन नम्बर को पूरे जिले में प्रचारित किया गया था। इस सामाजिक कुरीति को खत्म करने के लिए जनआंदोलन का स्वरूप दिया गया था और इसका इतना अच्छा परिणाम सामने आया। अगर कहीं बालविवाह होता भी तो खबर मिलती थी कि लोगों ने घर के अंदर लाईट बंद करके और ताला लगाकर बाल विवाह किया। इससे पहली बार लोगों के बीच यह संदेश गया कि बाल विवाह भी एक सामाजिक और कानूनी बुराई है। सन् 1930 से बाल विवाह निरोधक अधिनियम बना हुआ है लेकिन पहले कभी इसके क्रियान्वयन की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया था और इसका परिणाम यह रहा कि करीब 1000 बाल विवाह को रोका गया। राजनांदगांव कलेक्टर रहते हुए मैंने यह दावा किया था कि मेरे जिले में एक भी बाल विवाह नहीं हो रहा है और आज किसी भी जिले में कोई कलेक्टर इस तरह का दावा करने की स्थिति में नहीं है। इसी तरह संपूर्ण स्वच्छता अभियान में पहली बार राजनांदगांव जिले की 13 ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम का दर्जा देते हुए राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया गया। राजनांदगांव ही प्रदेश का पहला ऐसा जिला था जिसे यह पुरस्कार मिला। इसके बाद राज्य के अन्य जिलों में भी इस दिशा में कार्य हुए।
आपने बस्तर में भी कई योजनाएं चलाईं, वहां का अनुभव क्या रहा ? नक्सलवाद होने के बावजूद आपने वहां सफलता के झंडे गाड़े। इसकी विस्तृत जानकारी।
राजनांदगांव में जिस तरह संपूर्ण स्वच्छता अभियान का कार्य किया था वहीं बस्तर में यह कार्य काफी कठिन था क्योंकि राजनांदगांव ऐसा जिला है जहां साक्षरता सबसे अधिक है वहीं बस्तर में साक्षरता सबसे कम है। दूसरा राजनांदगांव जहां मैदानी जिला है, आवागमन के साधन अच्छे हैं वहीं, बस्तर वनाच्छादित, दुर्गम और जंगल के बीच बसा जिला है, जहां नक्सलवाद की समस्या भी व्याप्त है। इसलिए वहां शासकीय नीतियों और योजनाओं का क्रियान्वयन अन्य जिलों की तुलना में अधिक कठिन व चुनौतिपूर्ण रहता है। लेकिन यहां भी हमने ग्रामीण लोगों से मिलकर और पंचायत प्रतिनिधियों का सहयोग लेते हुए संपूर्ण स्वच्छता अभियान को क्रियान्वित किया। बस्तर क्षेत्र में दूषित पानी पीने से जनजनित बीमारियां अन्य जगहों की तुलना में अधिक थी। ऐसी स्थिति में वहां इस योजना का क्रियान्वयन किया जाना बहुत आवश्यक था। साफ-सफाई के प्रति भी वहां लोगों में जागरूकता कम है और इसका मूल कारण लोगों में साक्षरता की कमी है। बस्तर में मैं 15 जून 2006 से 14 अप्रैल 2008 तक कलेक्टर रहा। इस दौरान मैंने इस अभियान में तेजी लाने का प्रयास किया और इसका परिणाम यह रहा कि यहां की 27 ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम घोषित किया गया और इन्हें भी राष्ट्रपति के द्वारा पुरस्कृत किया गया। उस वर्ष पूरे प्रदेश में बस्तर ही एकमात्र ऐसा जिला था जहां सर्वाधिक ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम का पुरस्कार दिया गया था। दूसरी एक महत्वपूर्ण समस्या जगदलपुर शहर में जनसंख्या का दबाव बढऩे और अतिक्रमण के कारण शहर का चेहरा विकृत हो जाना थी। इसके सुधार के लिए एक योजना बनाकर और लोगों से चर्चा कर शहर के सात प्रमुख मार्गों से अतिक्रमण हटाने का कार्य किया। सड़क के किनारे स्थित धार्मिक स्थलों को हटाना कठिन कार्य था इसके लिए सभी धर्मों के पुजारियों के साथ बैठक की गई और उनसे सहयोग मांगा गया। इस तरह से मार्ग पर आने वाले 15 धार्मिक स्थलों को स्वेच्छा से हटाया गया, जो बहुत पुराने थे और यातायात को प्रभावित कर रहे थे। इसके साथ ही करीब 11 करोड़ रूपए की एक परियोजना बनाकर सड़कें और नालियां बनाई गईं और वृक्षारोपण किया गया। अतिक्रमण हटाओं अभियान की सफलता यह रही कि 1000 से अधिक लोगों ने स्वेच्छापूर्वक अतिक्रमण हटा लिये। वहां एक और प्रयोग किया गया शहर के चौक-चौराहों पर किसी महापुरूष की प्रतिमां लगाने के स्थान पर बस्तर की कला और संस्कृति को प्रदर्शित करने वाली कलाकृतियां लगाईं गई ताकि पर्यटक बस्तर की कला और संस्कृति को जान सकें। शहर के सात चौराहों का जो सौंदर्यीकरण हुआ उसका पूरे प्रदेश में सराहना हुई और शासन ने इस तरह के कार्य अन्य जिलों में भी करने को कहा। एक और महत्वपूर्ण कार्य जो बस्तर में हुआ वह है औद्योगिकरण। औद्योगिकरण की दृष्टि से यह जिला पिछड़ा था। बस्तर में टाटा स्टील का 5 मिलियन टन क्षमता वाले इस्पात संयंत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके लिए आसपास के दस गांवों में करीब 5 हजार एकड़ जमीन का भू-अर्जन की कार्रवाई को सफलतापूर्वक संपन्न कराया और 35 करोड़ से ज्यादा की राशि प्रभावित ग्रामीणों को वितरित की गई। इसके लिए नगरनार में बनने वाले एनएमडीसी के संयंत्र के लिए भी आवश्यक कार्रवाई की गई। एक और समस्या थी कि बस्तर कलेक्ट्रेट में कर्मचारी देर से कार्यलय आते थे। इसके अलावा यह भी शिकायत थी कि कुछ लोग कभी-कभी शराब पीकर भी कार्यलय आ जाते थे। इस स्थिति को देखते हुए बस्तर कलेक्ट्रेट को सेवासदन के रूप में विकसित किया गया। 1 जनवरी 2008 से स्थिति यह है कि कलेक्टर से लेकर सभी अधिकारी, कर्मचारी प्रतिदिन निर्धारित समय पर एक जगह इक_े होकर गांधीजी का प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जे पीर पराई जाणे रेÓ का गान करते हैं उसके बाद काम की शुरूआत होती है। इसका असर यह हुआ कि जो कर्मचारी शराब पीकर कार्यलय आते थे उन्होंने शराब पीना बंद कर दिया है। इसे मैं प्रशासन में किया गया बहुत बड़ा सफल प्रयोग मानता हूं।
आप उद्योग विभाग में भी रहे, उसके पहले रायपुर नगर निगम में प्रशासक। आज यह शहर छत्तीसगढ़ की राजधानी है इसका गौरव और बड़े इसके लिए क्या प्रयास होने चाहिए ?
जब मैं रायपुर नगर निगम का प्रशासक था तब यह व्यवस्था की थी कि पेयजल, प्रकाश और साफ-सफाई की ओर विशेष ध्यान दिया जाए। मैं सोचता हूं कि यदि तीन चीजों पर ध्यान दिया जाए तो आम आदमी की अस्सी से नब्बे प्रतिशत समस्याओं का ऐसे ही समाधान हो जाता है। मैंने ये प्रयास किया था कि हर जोन के अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में सफाई व्यवस्था देखें, बिजली व्यवस्था देखें और पेयजल व्यवस्था पर सतत नजर रखें। जोन के अधिकारियों को यह निर्देश भी दिया गया था कि वे रात में अपने क्षेत्रों में घूमकर यह देखें कि कितने खंभों में लाईट जल रही, कितने में नहीं। इसी प्रकार सफाई व्यवस्था देखने को भी कहा गया था। शहर के विकास में अतिक्रमण एक बड़ी समस्या थी जो अभी भी है। अपने छह माह के कार्यकाल के दौरान मैंने करीब 1000 अतिक्रमण हटवाए। उस समय पहली बार रायपुर में धार्मिक स्थलों को तोड़ा गया था, जो अवैध थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में वृक्षारोपण करवाया गया। वर्तमान समय में समग्र योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन करने की आवश्यकता है।
आपको अतिक्रमण हटाओ अभियान का जुनून सा रहा है। बसाओ अभियान के लिए भी क्या ऐसा ही कुछ होता रहा है ?
अतिक्रमण हटाओ अभियान तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक प्रभावित लोगों के लिए समुचित व्यवस्था न की जाए, चाहे वह अतिक्रमण रिहाईशी हो या व्यवसायिक हो। दोनों की प्रकार के अतिक्रमण हटाने के पहले जो लोग प्रभावित हो रहे हैं उनकी बातों को सुनना पड़ेगा, उनकी समस्याओं पर विचार करना पड़ेगा जो भी यथासंभव मदद वैकल्पिक बसाहट के रूप में आवश्यक हो व उचित हो वह उन्हें देना चाहिए। जहां भी मैंने अतिक्रमण अभियान चलाया वहां कहीं भी ये स्थिति नहीं हुई है कि कभी कोई कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो। मैंने जब भी अभियान चलाया उसमें खासबात यह रही जिन लोगों का अतिक्रमण तोड़ा गया उन्होंने स्वंय इस कार्य में सहयोग प्रदान किया। बस्तर में हमने इतनी बड़ी संख्या में अतिक्रमण हटाए लेकिन कोई भी व्यक्ति कोर्ट नहीं गया और न ही किसी ने मुआवजे की मांग की। यदि अतिक्रमण हटाने के कार्य में बड़े और छोटे लोगों का भेदभाव न किया जाए तो लोगों का पूरा सहयोग रहता है और इससे अच्छा संदेश जाता है। नियत साफ हो और बिना किसी पक्षपात के ईमानदारी से काम किया जाए तो लोगों का विश्वास और सहयोग हासिल किया जा सकता है। हमने जहां-जहां अतिक्रमण हटाए लोगों की वैकल्पिक बसाहट का प्रयास किया है।
वाणिज्यिक कर विभाग द्वारा इस वर्ष कर वसूली की क्या स्थिति रही है ?
इस वित्तीय वर्ष में 30 नवंबर तक की स्थिति में विभाग की वृद्धि दर करीब 3 प्रतिशत है। इसका अर्थ है विभाग ने नवंबर तक पिछले वर्ष की तुलना में 3 प्रतिशत अधिक वसूली की है। आथिक मंदी के चलते वसूली प्रभावित न हो इसके लिए विभाग द्वारा समुचित प्रयास किए जा रहे हैं।
सर्वाधिक राजस्व वसूली किस क्षेत्र से होती है ?
सर्वाधिक टेक्स वसूली भिलाई स्टील प्लांट, बालको, प्रकाश स्पंज आयरन, एसईसीएल और अन्य बड़ी कंपनियों के माध्यम से होती है। इसके अलावा पेट्रोल कंपनियां हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो इस्पात, कोयला, पेट्रोल और खनिज आधारित उद्योगों से सर्वाधिक राजस्व वसूली होती है।
सेल टेक्स चोरी करने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है ?
ऐसे क्षेत्र जहां सेल टेक्स चोरी की आशंका रहती है इसके लिए प्रवर्तन विंग गठित है। इसके लिए पूरे राज्य में दो उपायुक्त हैं जो स्थिति पर नजर रखते हैं। इनमें से एक का मुख्यालय रायपुर और एक का बिलासपुर में है। रिर्टन के आधार पर जिन संस्थानों पर शक होता है उन पर छापे की कार्रवाई की जाती है।
विभाग द्वारा उपभोक्ता जागरण पुरस्कार योजना शुरू की गई थी इसका कैसा प्रतिसाद रहा ?
उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के लिए यह इनामी योजना शुरू की गई थी और लोगों का इसके प्रति अच्छा रूझान देखने को मिला। दुकानदार यदि बिल देता है तो उसे इसका लेखा-जोखा प्रस्तुत करना पड़ता है। सेल टेक्स अप्रत्यक्ष कर है जो डीलर के माध्यम से ही प्राप्त होता है। उपभोक्ता जागरण योजना के तहत ग्राहकों से यह कहा गया था कि वो 500 रुपए से अधिक की जो भी खरीदी करते हैं उसका बिल अवश्य प्राप्त करें। इसके लिए दीपावली का समय चुना गया था इसका कारण है कि इस दौरान सभी लोग खरीददारी करते हैं। इसमें उन वस्तुओं को शामिल किया गया था जिनकी खरीदारी आमतौर पर लोग दीपावली के समय करते ही हैं। यह योजना काफी सफल रही। लगभग 50 हजार बिल लोगों ने ड्राप बाक्स में डाले। इसका सबसे बड़ा फायदा यह रहा कि इस योजना के माध्यम से पहली बार वाणिज्यिक कर विभाग आम उपभोक्ताओं तक पहुंच पाया है। इससे उपभोक्ताओं में यह संदेश गया है कि कोई भी खरीदारी करते समय रसीद अवश्य लेनी चाहिए। विभाग द्वारा प्रदेश के 32 लाख मोबाइल उपभोक्ताओं को एसएमएस के जरिए संदेश भेजकर बताया गया कि जो भी खरीदारी करें उसकी रसीद अवश्य लें।
इस योजना के तहत उपभोक्ताओं को पुरस्कार कब तक दिए जाएंगे ?
चुनाव के कारण राज्य में अभी आदर्श आचार संहिता लागू है। चुनाव संपन्न होने और आचार संहिता समाप्त होने के बाद पुरस्कार देने की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
अवैध शराब की बिक्री रोकने के क्या प्रयास किए जा रहे हैं ?
इसके लिए जांच उडऩदस्ता बनाया गया है। जहां पर शिकायत प्राप्त होती है वहां टीम जाकर कार्रवाई करती है।
केन्द्र सरकार 1 अप्रैल 2010 से गुड्स एण्ड सर्विस टेक्स (जीएसटी) लागू करने जा रही है। इसके लिए विभाग द्वारा क्या तैयारियां की गई हैं ?
जीएसटी का मतलब गुड्स एण्ड सर्विस टेक्स है। जिस तरह पहले सेल टेक्स हुआ करता था उसके बाद वैल्यू एडेड टेक्स आया, इसी कड़ी में जीएसटी है। इसमें कई तरह के करों को एक में ही मिला दिया गया है जैसे मनोरंजन कर, विलासिता कर आदि। इसमें वस्तु और सेवाकर मिला होगा। यह दो प्रकार का होगा एक स्टेट जीएसटी और दूसरा सेंट्रल जीएसटी होगा। इसमें केन्द्र और राज्य अलग-अलग वस्तुओं पर कर लगाएगा। इसमें कुछ नए प्रावधानों को शामिल किया गया है। हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे 1 अप्रैल 2010 की बजाय 1 अप्रैल 2011 से लागू करने की मांग रखी है। अभी इस बारे में अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। इस संबंध में वाणिज्यिक कर विभाग व्यापारियों से चर्चा कर उनकी राय भी जान रहा है और यह प्रक्रिया अभी चल रही है।
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